मकडी

बुनती है जाला
बडी आशा ,विश्वास के साथ
कि वह बना लेगी
एक प्यारा सा घर सन्सार
देखती है सुन्दर से सपने और
बुनती चली जाती है अपने ही गिर्द
एक ऐसा चक्रव्यूह
बन्द करती जाती है
बाहर निकलने के हर रास्ते
नही छोडती कोई भी खिडकी खुली
ताकि जमाने की बुरी निगाहे
देख न पाएँ
पर नही जानती कि वह खुद ही
अपने बुने हुए जाल मे
फँस कर रह जाती है
नही निकल पाती
अपने ही बुने हुए जाल से बाहर
और उड जाते है उसके प्राण पखेरु
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