KACHARE VAALI( A hindi poem)

Jun 26 2008  | Views 222 |  Comments  (8)
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कचरे वाली.........


सुबह सवेरे कचरा गाडी आती है
घर के बाहर पडा कूडेदान का
सारा कचरा उठाती है
और आगे निकल जाती है
 अन्दर का कचरा पर नही उठाती
न ही उसे अन्दर आने की अनुमति है
क्योन्कि..........
क्योन्कि वो है कचरा उठाने वाली
साफ नही है वो
उसको कचरे से प्यार है
जिन हाथो से कचरा उठाती है
उन्ही हाथो से खाना भी खाती है
नही है उसे कचरे से नफरत
सुहाती है उसे कचरे की बदबू
नही होता उसे कोई इन्फैक्शन
न ही पनपते है उसके शरीर मे
बिमारियो के भयानक किटाणु
जिनके डर से बुहारते है हम
अपने घर आँगन का द्वार
किटाणुओ से मुक्ति हेतु
लगाते है फिनायल का पोछा
लेकिन फिर भी नही कर पाते हम
अन्दर की साफ-सफाई
पनपते रहते है अन्दर ही अन्दर किटाणु
जिस पर बेअसर होता है
फिनायल का जहर भी
और हम हो जाते है
अह्म ,स्वार्थ ,नफरत,क्रोध जैसी
लाइलाज बिमारियो के शिकार
यह किटाणु कचरे उठाने वाली को
नही करते प्रभावित
 और साफ सुथरे मन से
घर के बाहर पडा
सारा कचरा उठाती है
और आगे निकल जाती है


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© sima sach., all rights reserved.

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