उधार की जिन्दगी
काम्प जाती है रूह
दहल जाता है दिल
छलकते है आँसु
ठहर सा जाता है वक़्त
रुक जाती है साँसे
बढ जाती है धडकन
उठती है टीस
किसी अनन्त गहराई से
नष्ट हो जाता है विश्वास
किसी अनश्वर सत्ता से
जब देखते है
मौत से भी भयानक मञ्जर
लहु-लुहान लाशे
कुरलाते बच्चे
उजडे सुहाग
सूनी गोदियाँ
बूढे कन्धो पर
जवान अर्थी का बोझ
मौत को भी कम्पकम्पाता दृश्य
तरसती आँखे
बिन माँ के लाल
आसमान को
चीरता हुआ धमाका
और पलो मे उडते हुए
निर्दोष हड्डियो के परखचे
तो एक बार फिर से
कराह उठता है यह मन
हे वसुधे! फिर से एक
बार इतिहास दोहराओ
और आज फिर से फट जाओ
ले लो अपनी सन्तान को
फिर से अपनी गोदि मे
तुम्हारे आँचल की छाया मे
शायद मिल सके उधार की जिन्दगी
जयपुर धमाको को देखकर तो यही कहने को मन करता है कि हे वसुधे ! तुम फट जाओ |यह सब भयानक मञ्जर दिखाने से पहले हमे ले लो अपनी गोदि मे |
लेकिन जान्ती हूँ कि इस का कोई हल नही है ,बस दैत्य-बुद्धि के सामने केवल आँसु बहा सकते है |......सीमा सचदेव

Recommend
votes