कठपुतली

न जाने कहाँ से आती है
कम्बख्त मुझे बडा सताती है
हर बात मे पहले अपनी टाँग अडाती है
जब इसकी मान लो तो ठीक
नही तो सपनो मे भी आ के डराती है
मेरे दिमाग की इसके आगे कभी न चली
है यह बडी ही मनचली
दबा लेती थी मुझे जब मै बच्ची थी
मेरी उम्र भी तो कच्ची थी
मान लेती मै इसकी हर बात
पर कभी न मिली कोई सौगात
थोडा होश सँभाला तो
मै दबाने लगी उसको
डर जाती थी सपनो मे देख कर जिसको
पर मै अब उसे वश मे करने लगी थी
मन मर्जी से जीने लगी थी
बहुत बार अनसुनी की मैने उसकी बकबक
फिर भी वो हटती नही मारने से झक
नही सुनती मै ,फिर भी बोलती
मेरे अपने ही राज मेरे ही सम्मुख खोलती
पर मैने सीख लिया था उससे लडना
उसकी बेतुकी बातो की परवाह न करना
कैसे कर सकती थी मै....?
उसी की बकबक सुनती
तो कैसे जी सकती थी मै...?
कोई भी तो नही करता
फिर मै भला क्यूँ करूँ उसकी परवाह ?
क्या दुनिया मे मिलेगी मुझे पनाह ?
मैने उसको मार दिया
मन का बोझ उतार दिया
फिर मुझे उसकी बाते सुनाई नही दी
सच्च तो यह है कि
वो फिर सपने मे भी दिखाई नही दी
क्यो दिखती......?
मैने उसे मार जो दिया
अपने आप को आज़ाद कर लिया
पर बहुत बेशर्म है यह
मर कर भी जाग पडी
आज फिर मेरे सामने
आकर हो गई खडी
रह गई मेरी आँखे फटी की फटी
और वो फिर से रही अपनी बकबक पे डटी
और मैने फिर से पाया अपने आप को
मजबूर ,लाचार , बेबस , कमजोर
बस उसी के हाथो की कठपुतली
कोई और नही ,
यह है मेरी आत्मा
जो लेती है हर पल मेरी इच्छाओ की बलि
***********************************************

Recommend
votes