हे कविते
हे कविते
क्या पावन
रूप है तुम्हारा
भवुक हृदय का
तुम्ही तो हो सहारा
स्वच्छन्द प्रवाहित निश्चल
ज्यो
सूर्य की पहली किरण से
खिलता हुआ कमल
साहित्याकाश पर
सूर्य की भान्ति देदिप्यमान
कोमल सुन्दर
निष्कपट , बन्धन रहित
भावो का अरमान
हुआ
क्रोञ्च पक्षी का वध
निकले मुँह से ऐसे शब्द
बहने लगी
भावो की ऐसी सरिता
हो गई अमर कविता
बदले
युगो-युगान्त्रो मे
न जाने तुमने कितने रूप
फिर भी
हे कविते
नही बदला तेरा सुरूप
वही
बनी रही
नाजुकता , कोमलता , भावुकता
रहा
हर युग मे
कवि इसमे बहता
हे कविते
नही बन्ध सकती
तुम किसी बन्धन मे
तुम तो
बसती हो
हर भावुक मन मे
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