आज मान्यवर ,उच्च कोटि के कवि महाश्य "सूत्रधर जी का ब्लोग पढकर बडा अच्छा लगा कि कविता को कविता की कसौटी पर कसा जाना चाहिये |
(हम उनकी बहुत इज्जत करते है लेकिन हिन्दी मे लिखा है तो हम सोचने और कुछ कहने पर मज्बूर है)
लेकिन कौन सी कसौटी? , अगर यह बात भी ऐसे महान कवि द्वारा बताई गई होती तो सुलेखा पर कविता लिखने वाले सबका भला हो जाता |
और मान्यवर द्वारा आलोचना की बात भी कही गई है , तो हम जैसे तुच्छ प्राणी ,जितनी ईश्वर ने हमे बुद्धि दी है उससे यह सोचने पर मजबूर है कि आलोचना का स्तर क्या होता है?अगर इस दोसत द्वारा आलोचना का स्तर भी समझाया गया होता तो अच्छा होता ,और हम भी कभी आलोचक बनने की बात सोच लेते |
अपने आप को सबसे अलग दिखाने के लिए कुछ भी बिना सिर पैर के कह देने से आलोचना का स्तर गिरता है||मानयवर दोसत द्वारा एक महान कवि का उदाहरण दे कर शायद यह कहने का प्र्यास किया गया है कि सबको उन जैसा लिखना चाहिये |
किसी द्वारा किस शैली मे लिखा गया है ,यह आलोचना का स्तर नही है|सबकी अपनी शैली होती है,और ईश्वर ने ही सबको एक दूसरे से अलग बनाया है |
आलोचना होनी चाहिए :-क्या लिखा गया है और क्यो ?और अगर कुछ एतिहासिक लिखा गया है तो वह कितना सार्थक है या फिर उसमे कुछ नयापन है तो क्यो? वह उचित है या अनुचित |
कविवर "मैथिलीशरण गुप्त" जी के महा-काव्य "साकेत " की कुछ पन्क्तियाँ लिख रही हूँ जिसमे भाव बिलकुल वही है जो "तुलसीदास" जी ने अपनी "कवितावली" मे लिखा है लेकिन दोनो की शैली अलग है:
तुलसीदास जी की "कवितावली" मे जब राम,लक्ष्मण और जानकी वन जा रहे थे तो कुछ ग्राम वधुएँ जानकी जी से जानने का प्रयास करती है कि उसके साथ दोनो वीर कौन है , तो जानकी बिना कुछ बोले केवल आँखो के इशारे से ही उनको समझा देती है कि राम उसके पति है और लक्ष्मण देवर:
"सुनि सुन्दर बैन सुधारस साने
स्यानी है जानकी जानि भली
तिरिषे करि नैन दे सैन तिन्हे
समुझाय कछु मुसुकाए चली"
यहाँ पर जानकी ने मुँह से एक शब्द भी नही बोला और अपनी बात समझा दी , वही "मैथिलीशरण गुप्त" जी के भाव देखिये | ग्राम वधुएँ जानकी से पूछती है:-
"शुभे तुम्हारे कौन उभै ये स्रेष्ठ है"
तो अब जानकी यहाँ पर बोल कर जवाब देती है:-
"गोरे देवर श्याम उन्ही के ज्येष्ठ है"
भाव बिल्कुल वही लेकिन शैली बिलकुल अलग |और यही बात अगर आज का कोई कवि अपनी शैली मे इस प्रकार व्यकत करे कि:-
और ग्राम वधुएँ जानकी से यह पूछ ले कि:
who is he?
और सीता माता आगे से यह कहे कि:
he is Mr. Raam my husband .
तो कोई बडी बात नही है | कोई कह सकता है |
किसी भी रचना पर तीन चीजो का गहरा प्रभाव होता है और वह है
१.देश
२.काल
३.वातावरण
जब भी कुछ लिखा जायेगा इन तीनो चीजो का प्रभाव उस पर दिखेगा ही दिखेगा ,इससे कोई भी रचना अलग हो ही नही सकती |ऊपर दोनो उदाहरण मे यह बात सपष्ट है |फिर पता नही किस आलोचना की बात की जा रही है |किस पर आलोचना होनी चाहिए शैली पर या फिर उस रचना के विषय पर |कैसे लिखा ये आलोचना नही , क्या लिखा और क्यो लिखा आलोचना का विषय है |
कविता कविता होती है |
क्या कविता को किसी सीमा मे बाँधा जा सकता है ?अगर ऐसा है तो "निराला" जी की कविता की कुछ पँक्तियाँ लिख रही हूँ :-
"साँप
तुम सभ्य तो हुए नही
नगर मे बसना भी
तुम्हे नही आया
एक बात पूछूँ
उत्तर दोगे......
कहाँ से सीखा डसना
विष कहाँ से पाया "
एक और देखो:-
"वह आता
दो टूक कलेजे के करता
पछ्ताता
पथ पर आता
पेट पीठ दोनो
मिलकर है एक
चल रहा लकुटिया टेक
मुठी भर दाने को
भूख मिटाने को
मुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता
वह आता "
इन दोनो कवितायो को आधुनिक युग के महान कवि ने दिल की गहराई से लिखा है |मै पूछ्ना चाहुँगी कि क्या इसको कोई किसी सीमा मे बाँधा जा सकता है....?
"एक आलोचक सबसे अच्छा दोसत होता है, लेकिन अगर आलोचना सोच-समझ कर और पूरी जानकारी के साथ की जाए तो |आलोचक के लिये विषय की पूरी जानकारी होना और और उस पर गहन अध्ययन बहुत आवश्यक होता है |हर एक रचना हर किसी को पसन्द आए आवश्यक नही लेकिन इसका मतलब यह तो नही कि उसको पसन्द नही तो वह उसको बुरा ही कहदे |आलोचना का अर्थ ही तर्क देना है , अगर आलोचना करनी है तो तर्क देना भी आवश्यक है |जब किसी रचना पर बिना किसी तर्क के प्रश्न उठाया जाता है तो यह आलोचना नही कहलाती , वह तो स्वयम को दिखाने की कोशिश होती है कि हम सबसे अलग है |
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